सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि राज्य सरकारें महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) बढ़ाते समय नौकरी कर रहे कर्मचारियों और रिटायर हो चुके कर्मचारियों (पेंशनभोगियों) के बीच भेदभाव नहीं कर सकतीं। अदालत ने कहा कि महंगाई का असर दोनों पर समान रूप से पड़ता है, इसलिए उन्हें अलग-अलग दरों पर लाभ देना गलत है। यह फैसला जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने केरलम सरकार और केरलम राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें पेंशनभोगियों को अलग दर से महंगाई राहत (DR) देने का फैसला सही ठहराया गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि रिटायर हो चुके कर्मचारियों को भी समानता का अधिकार है और उन्हें किसी भी तरह से कमतर नहीं माना जा सकता।
समानता का अधिकार और कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला दिया, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। कोर्ट ने कहा कि समानता एक जीवंत और विकसित होने वाली अवधारणा है, इसे सीमाओं में बांधकर नहीं देखा जा सकता। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि समानता और मनमानी एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं। जहां समानता कानून के शासन को मजबूत करती है, वहीं मनमानी एक तानाशाही सोच को दर्शाती है। इसलिए सरकार कोई भी ऐसा फैसला नहीं ले सकती जो बिना ठोस आधार के भेदभाव पैदा करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान ‘वर्गीकरण’ (classification) की अनुमति देता है, लेकिन वह तार्किक होना चाहिए। इसके लिए दो शर्तें जरूरी हैं। वर्गीकरण किसी स्पष्ट और ठोस अंतर पर आधारित हो उस अंतर का उद्देश्य से सीधा संबंध होना चाहिए। अगर ये दोनों शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो ऐसा वर्गीकरण असंवैधानिक माना जाएगा।
महंगाई राहत पर कोर्ट का स्पष्ट रुख
इस मामले में मुख्य विवाद महंगाई भत्ता (DA) और महंगाई राहत (DR) की अलग-अलग दरों को लेकर था। कोर्ट ने कहा कि पेंशनभोगी केवल पेंशन ही नहीं, बल्कि महंगाई राहत के भी हकदार हैं, जो समय-समय पर महंगाई के आधार पर बढ़ाई जाती है। कोर्ट ने साफ किया कि यहां सवाल यह नहीं है कि पेंशनभोगी इस लाभ के पात्र हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें अलग दर से क्यों दिया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि जब महंगाई का असर नौकरी कर रहे और रिटायर दोनों तरह के कर्मचारियों पर समान रूप से पड़ता है, तो उन्हें अलग-अलग दरों पर लाभ देना पूरी तरह मनमाना और भेदभावपूर्ण है। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अगर कोई लाभ एक समान उद्देश्य जैसे महंगाई से राहत के लिए दिया जा रहा है, तो उसमें भेदभाव करना संविधान के खिलाफ है।
फैसले का व्यापक असर
इस फैसले का असर देशभर के लाखों पेंशनभोगियों पर पड़ सकता है। अब राज्य सरकारों और सरकारी संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे महंगाई राहत तय करते समय सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच कोई भेदभाव न करें। यह फैसला पेंशनभोगियों के अधिकारों को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि रिटायर होने के बाद भी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आर्थिक नीतियों में भी समानता का सिद्धांत लागू होगा और किसी भी तरह की मनमानी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
Picture Source :

